कबीर दास की जीवनी – Kabir Das Biography In Hindi

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दोस्तों आपने कबीर दास जी के दोहे, रचनायें, Poems तो बहुत पढ़े होंगे, लेकिन अगर आप कबीर दास जी के बारे में जानना चाहते हो तो आज इस पोस्ट में हम kabir das information, about kabir das in hindi, कबीर दास की जीवनी – Kabir Das Biography In Hindi के बारे में डिटेल में जानिंगे।

भारत में इतनी विविधता है कि उसका उल्लेख करना लगभग असंभव है। हमारे देश में कई धर्म, वर्ग, समाज आदि बने परंतु समय के साथसाथ इनमें निरंतर बदलाव भी होते रहे हैं। यदि हम अपने इतिहास के बारे में जाने तो यहां पर कई विद्वान तथा महापुरुष पैदा हुए हैं। भारत भूमि भगवान राम से लेकर महात्मा गांधी के ज्ञान से प्रभावित है, उन्होंने अपने अच्छे विचार और ज्ञान के माध्यम से भारत को एक नया रूप देने की कोशिश की है।

यहां पर कई संत, महात्मा पैदा हुए हैं और उन्होंने भी अपने रचनाओं और ज्ञान से एक नई ऊर्जा को जन्म दिया है। आज भी उनका उल्लेख हमारे किताबों में मिलता है ऐसा ही एक भक्ति काल है इस काल में मीराबाई से लेकर कबीर दास तक कई महात्मा कभी पैदा हुएं है। उनकी रचनाओं ने अपने प्रभु के प्रति जो आस्था दिखाई है उसका वर्णन आज भी मिलता है जिस तरह मीराबाई भगवान कृष्ण की भक्ति में लीन रहती थी। उसी तरह कबीर दास जी अपने प्रभु श्री राम के भक्ति में लीन रहते थे।

आज हम इस लेख में आपको कबीर दास (कबीर दास की जीवनी – Kabir Das Biography In Hindi) के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी देंगे तथा हम यह भी बताएंगे कि कबीर दास ने अपने जीवन काल में कितनी रचनाएं की और अपने प्रभु राम के प्रति उनकी भावनाओं का भी उल्लेख करें।

कबीर दास की जीवनी – Kabir Das Biography In Hindi

कबीर दास जी भक्ति काल के एक प्रमुख संत और कवि है उन्होंने अपने सकारात्मक विचारों और कल्पना शक्ति के माध्यम से कई सारी रचनाएं लिखी है जो भारत के संस्कृति को दिखाती है। इन रचनाओं में कबीर दास के समाज सुधारक एवं भगवान के प्रति आस्था दिखाई देती है। कबीर दास एक महान विचारक एवं समाज सुधारक भी थे उन्होंने अपने ज्ञान के माध्यम से समाज में चल रहे, गलत परंपराओं एवं प्रथाओं को हटाने पर हमेशा जोर दिए हैं।

यदि हम कबीर दास को किसी एक धर्म का माने तो यह गलत होगा, कबीर दास को हिंदू, मुस्लिम तथा सिख तीनों धर्म का ज्ञान तथा अपने ग्रंथ में उन धर्मो के विचार दिखाई देते है। अपनी रचनाओं में एक महत्वपूर्ण झलक दिखाई देती है। वह भक्ति काल के निर्गुण भक्ति धारा से प्रभावित थे, उन्हें भारत में एक संत की उपाधि प्राप्त है।

भारत में उनके जन्मदिन को बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है क्योंकि उन्होंने समाज के प्रति उच्च नीच तथा भेदभाव जैसी बुराइयों को दूर करने की कोशिश भी की है। हिंदी साहित्य में अपना ही एक अलग स्थान और योगदान के माध्यम से बहुत सम्मान प्राप्त है। आज भी युवा पीढ़ी उनके ज्ञान को और रचनाओं के माध्यम से नई रचनाएं करते हैं कबीरदास भगवान राम के सबसे बड़े भक्त कहे तो यह गलत नहीं है उन्होंने अपना जीवन अपने प्रभु राम के लिए निछावर कर दिया था।

कबीर दास का जन्म

कबीर दास 15वीं सदी के निर्गुण शाखा के काव्य धारा के प्रवर्तक तथा संत थे, इन्होंने हिंदी साहित्य को भक्ति कालीन युग से जोड़ा है। इनके द्वारा कई समाज सुधारक कार्य किए गए आज के इतिहासकार भी उनके जन्म से संबंधित कई प्रकार की विचारधारा रखते हैं।

नके जन्म को लेकर आज भी एक निश्चित तारीख नहीं है, फिर भी ज्यादातर इतिहासकारों का यह मानना है कि इनका जन्म 1455 में हुआ था तथा जन्म स्थान को भी लेकर यही समस्या है परंतु पुराने तथ्यों के आधार पर इनका जन्म राम तारा काशी में हुआ था। इनके पिता का नाम नीरू तथा माता का नाम नीमा था।

कबीर दास का वैवाहिक जीवन

उनका विवाह बहुत ही कम उम्र में हो गया था उनकी पत्नी का नाम लोई था। यह अपने वैवाहिक जीवन में काफी कुशल मंगल तथा स्वभाव से शांत रहने वाले व्यक्ति थे। ऐसा माना जाता है कि इनकी माता एक विधवा ब्राह्मण थे इनको बचपन में ही तालाब के पास छोड़ कर चली गई थी,

परंतु कबीर का लालन पालन एक मुस्लिम परिवार ने किया और उन्हें इस्लाम से संबंधित जानकारी दी। इनकी शादी भी एक गरीब परिवार की लड़की लोई के साथ हुआ। इनके दो बच्चे थे जिनका नाम कमाल जो पुत्र तथा कमाली पुत्री थी। उस समय काफी कम उम्र में ही संतान की प्राप्ति हो जाया करती थी।

कबीर दास की शिक्षा

वैसे तो कबीर की रचनाओं में वह सारे गुण नजर आते हैं जिनमें एक विद्वान की रचनाओं के तरह प्रतीत होते हैं परंतु आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि कबीरदास है, अशिक्षित व्यक्ति थे जो कभी विद्यालय नहीं करें। वह निरक्षर होने के बावजूद भी उन्होंने अपने ज्ञान से समाज सुधार तथा रचनाओं के माध्यम से इतिहास में एक महत्वपूर्ण जगह बनाई है।

बाद में जब कबीर दास बड़े हुए तो उनकी बड़ी आंतरिक इच्छा थी कि उनके गुरु संत आचार्य रामानंद जी बने परंतु उनके कुछ कारणों के वजह से आचार्य रामानंद जी ने उन्हें अपना शिष्य बनाने से इंकार कर दिया था।

उन्होंने कहा कि आप मेरे शिष्य नहीं बन सकते हैं परंतु कबीर दास ने यह ठान लिया था कि यदि मेरा कोई गुरु बनेगा तो वह केवल आचार्य रामानंद जी ही बनेंगे। इस तरह उन्होंने आचार्य रामानंद द्वारा ज्ञान की प्राप्ति की कबीरदास और आचार्य रामानंद से जुड़ी एक कहानी काफी प्रचलित है। एक बार सुबह के समय में आचार्य रामानंद गंगा नदी में स्नान कर रहे थे, तब जिस रास्ते से रामानंद जाया करते थे उस रास्ते में एक मंदिर पड़ता है।

वहां पर सीढ़ियां में कबीर दास उन्हें मनाने के लिए कबीर दास सीढ़ियां में लेट गया और वहां से जब तक नहीं गए तब तक आचार्य रामानंद स्नान कर कर नहीं लौटे जाते। आचार्य का पैर कबीर के ऊपर पड़ा तो कबीर के मुख सेरामशब्द निकला इसको देखते हुए आचार्य रामानंद में कबीर दास को अपना शिष्य बना लिया और उन्हें शिक्षा दीक्षा देने लगे। इस तरह से उनकी रचनाओं में प्रभु श्री राम के बारे में सबसे ज्यादा भक्ति भाव नजर आता है।

कबीर की भाषा

इनकी भाषा काफी ज्यादा मिलावटी थी इसमें विभिन्न स्थानीय बोलियों का मिश्रण हुआ करता था। यदि आप इनकी रचनाएं पढ़ेंगे तो इनमें राजस्थानी, पंजाबी, खड़ी बोली, अवधी, ब्रज भाषा आदि के शब्द मिलते हैं। उनकी रचनाएं पंचमेल खिचड़ी और सधुक्कड़ी भाषा से बनी हुई है इसीलिए इनकी रचनाओं को बड़े आसानी से हर कोई समझ सकता है।

कबीर दास की रचनाएं

कबीर दास ने अपनी रचनाओं में भगवान राम की भक्ति के बारे में ज्यादा वर्णन किया है। कबीरदास की रचनाओं और विचारों के माध्यम से बहुत विख्यात हो गए थे, इसीलिए उनकी शिष्य भी बढ़ते गए उन्हीं में से उनके शिष्य धर्मदास ने उनके वाणी का एक संग्रह बनाया उसका नामबीजकहै बीजक नाम के ग्रंथ में 3 मुख्य भाग हैं जो इस प्रकार है:-

साखी:यह संस्कृत के शब्द साक्षी से लिया गया है। जिसका मतलब धर्म का उपदेश है इसमें कबीर की शिक्षा और सिद्धांतों का निरूपण दिखाई देता है।

सबद:- यह पूरी तरह से संगीतात्मकता भाग है। इसमें उपदेश कबीर के प्रेम और साधना के बारे में वर्णन मिलता है।

रमैनी:- यह चौपाई छंद में लिखा गया है इसमें कबीर के दार्शनिक विचार और रहस्यवाद दें कवि के रूप में भाव प्रकट किया गया है।

कबीर दास के दोहे का हिंदी में अर्थ

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ, मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ

इस दोहे में कबीर दास जी कहना चाहते हैं कि जो लोग कोशिश करते हैं वह लोग कुछ ना कुछ वैसा ही पा लेते हैं जैसे कोई गोता खबर गहरे पानी में मेहनत करता है और वहां से कुछ लेकर ही आता है लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो पानी में डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रहते हैं और इस वजह से उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होता है।

इस दोहे में दिए गए उपदेश को बड़े सकारात्मक रूप से बताया गया है कि किस तरह मेहनत के बिना जीवन में कुछ भी प्राप्त नहीं होता है। कड़ी मेहनत ही बड़ी सफलता का रास्ता होता है। हम इस बात से यह भी अनुमान लगा सकते हैं कि नहीं कबीर की सोच कितनी दार्शनिक और गहरी है।

भगवान राम के प्रति कबीर दास की भक्ति

वह राम के निर्गुण सगुण भेद से परे हैं वास्तविक रूप से देखा जाए तो उन्होंने अपने राम को अवतारी, शास्त्र, वर्णाश्रम व्यवस्था के संरक्षण राम से अलग करने के लिए ही निर्गुण राम शब्द का प्रयोग किया। उन्होंने कहा कि ईश्वर किसी नाम, रूप, गुण, काल आदि की सीमा में बांधा नहीं जा सकता है, वह सारी सीमा से परे हैं और वह सभी जगह में मौजूद है। और जो सभी जगह पाए जाते हैं वही कबीर केनिर्गुण रामहै। उन्होंने इसेरमता रामनाम दिया।

कभीकभी वह राम क्यों वात्सल्य मूर्ति के रूप में भी मां मान लिया करते थे और खुद को उनका पुत्र मान लिया करते थे। अनन्य मानवीय प्रेम कबीर के भक्ति में भगवान राम के लिए था। वह अपनी हर समस्या उनके सामने कहते हैं और उसका हल भी निकाल लेते थे।

धर्म के प्रति कबीर दास के विचार

कबीर दास ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे परंतु उनका लालनपालन एक मुस्लिम परिवार में हुआ है इसीलिए उनको हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों के बारे में अच्छा ज्ञान था। एक समाज सुधारक भी थे और उनके शिष्य भी विभिन्न धर्मों के थे इस बात से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह सभी धर्मों को एक समान मानते थे और किसी तरह का भेदभाव नहीं करते थे परंतु उन्होंने अपने समस्त विचारों में राम नाम की महिमा का गुणगान किया है उन्हें एक ईश्वर माना करते थे।

वह मूर्ति पूजा, रोजा, ईद, मंदिर, मस्जिद आदि को नहीं मानते वह धर्म सुधारक होने के नाते इन धर्मों में जो भी गलत प्रथाएं थी उनकी कड़ी निंदा करते थे और उन्हें रोकने के लिए भी प्रयास किया करते थे।

कबीर दास की मृत्यु

जैसे जन्म का पुख्ता सबूत नहीं है किसी के पास उसी तरह से मृत्यु का भी किसी के पास कोई सबूत नहीं है परंतु कुछ विद्वानों का मानना है कि इनका निधन संवत 1551 में हुआ था परंतु कबीर का कहना है कि कर्मों के अनुसार हमें फल प्राप्त होता है।

उन्होंने अपने दोहे में यह व्याख्यान किया है कि अंतिम समय में साबित करने के लिए वह मगहर में रहने लगे क्योंकि कुछ लोगों का उस समय कहना था कि जो मगहर में मरते हैं वहां नर्क में जाते हैं और जो काशी में मरते हैं वह स्वर्ग में जाते हैं इसलिए उन्होंने अपनी अंतिम का आज मगहर में ली और वहां पर उनका निधन हो गया।

आशा करता हूं मेरे द्वारा दी गई जानकारी से आप संतुष्ट होंगे। इस लेख का उद्देश्य कबीर दास के जीवन के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी प्रदान करना है तथा उनके विचारों को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना है, जिससे उनके विचारों को लोग अपने जीवन में अपना सके और ज्ञान प्राप्त कर सके।

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