गुरुपूर्णिमा पर भाषण – Speech On Guru Purnima In Hindi


दोस्तों अगर आप गुरुपूर्णिमा पर भाषण या स्पीच देना चाहते हो तो आजके इस पोस्ट में हम Guru Purnima Speech for Students, Teachers and everyone, गुरुपूर्णिमा पर भाषण – Speech On Guru Purnima In Hindi के बारे में जानिंगे।


हमारी संस्कृति में गुरु को भगवान से भी ऊंचा दर्जा दिया गया है। गुरु शिष्य का मार्ग दर्शन करके उसके जीवन को सफल बनाते हैं इसलिए जीवन में आगे बढ़ने के लिए गुरु का होना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। पौराणिक कथाओं से लेकर आज के आधुनिक जीवन में हमें अनेक ऐसी कथाएं सुनने को मिल जाती हैं! जिसमें एक व्यक्ति की सफलता के पीछे गुरु का विशेष हाथ होता है।

अतः जब हमारे जीवन में गुरु का इतना प्रभाव है तो गुरु को सम्मानित करने का भी एक दिन होना चाहिए।


भारतीय संस्कृति में यही दिन गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है, इस दिन एक शिष्य अपने गुरु को  समर्पित करता है। और जीवन में सफलता की सीढ़ियां चढ़ने का आशीर्वाद प्राप्त करता है।

यदि आपको भी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर अपने विचार रखने का मौका मिला है तो आज के इस लेख के माध्यम से हम आप तक Guru Purnima Speech in Hindi, गुरुपूर्णिमा पर भाषण लेकर आए है।

गुरुपूर्णिमा पर भाषण – Speech On Guru Purnima In Hindi

भाषण 1 (Long Speech On Guru Purnima In Hindi)

गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर आदरणीय प्रधानाचार्य जी एवं सम्मानीय शिक्षक गणों को मेरी ओर से सुप्रभात! आज हम भारतीय संस्कृति के प्रमुख पर्वों में से एक गुरु पूर्णिमा मनाने के लिए उपस्थित हुए हैं। और मुझे इस अवसर पर अपने विचारों को रखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है

पुराणों में भी इस बात का वर्णन है कि गुरु ब्रह्मा के समान है। अतः

करता करे न कर सके
गुरु करे सब होय
सात द्वीप नौ खंड में
गुरु से बड़ा न कोए।

इस सुविचार के साथ गुरु पूर्णिमा की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। युगो युगो से भारतीय संस्कृति में शिष्यों द्वारा अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता एवं सम्मान को प्रकट करने हेतु गुरु को समर्पित यह दिन गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है।

हिंदू पंचांग के आषाढ़ की पूर्णिमा को यह पर्व मनाया जाता है। प्रतिवर्ष जून जुलाई के महीने में आमतौर पर गुरु पूर्णिमा का पर्व आता है। संस्कृत में गुरु शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है! इसमें गु का अर्थ है “अंधकार” एवं रू का अर्थ है “प्रकाश” अर्थात हमें अंधकार रुपी जीवन से प्रकाशमय जीवन की ओर ले जाने वाला व्यक्ति हमारा गुरु होता है।

हमारी बाल्यवस्था से लेकर हमारी युवावस्था या फिर कहें तो हमारे पूरे जीवन में हमारे गुरु हमें सदैव कुछ ना कुछ सिखा कर हमारा मार्गदर्शन करते रहते हैं! ताकि हम जिंदगी के सही पथ पर चल कर स्वयं का, परिवार का एवं पूरे राष्ट्र का नाम उज्जवल कर सके।

अतः यदि कोई भी व्यक्ति यदि जीवन में सफल होता है तो उसमें उसके गुरु की अहम भूमिका होती है। गुरु पूर्णिमा को मनाने के पीछे पौराणिक मान्यता है कि महर्षि वेदव्यास इस पृथ्वी में समस्त मानव जाति के गुरु हैं!

इसलिए गुरु पूर्णिमा के अवसर पर लोग महर्षि वेदव्यास के चित्र का पूजन कर उन्हें याद करते हैं! माना जाता है आज से 3,000 वर्ष पूर्व महर्षि वेदव्यास जी का जन्म हुआ था उनके द्वारा रचित ग्रंथ लोगों के जीवन के लिए बहुउपयोगी साबित हुए जिनका आज भी अध्ययन होता है।

इसके अलावा मान्यता है कि आज ही के दिन भगवान गौतम बुद्ध ने पहली बार सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया। वहीं योग परंपरा के अनुसार भगवान शिव जी ने इसी विशेष दिन पर सप्त ऋषियों को योग का ज्ञान दिया था। शास्त्रों में गुरु को देवताओं के तुल्य माना गया है अतः गुरु पूर्णिमा के इस त्योहार को भारत के अनेक राज्यों में शिष्यों द्वारा गुरु की याद में मनाया जाता है! ।

भारत नेपाल भूटान जैसे देशों में विभिन्न धर्म के अनुयायाई विशेषकर हिंदू जैन बौद्ध धर्म के लोगों द्वारा  अपने पारंपरिक रीति रिवाज में गुरु पूर्णिमा के इस त्यौहार को मनाया जाता है। प्राचीन काल से ही गुरु पूर्णिमा के अवसर पर लोग अपने ब्रह्मा कालीन गुरु एवं संतों की चरण पादुकाओं की पूजा अर्चना करते हैं।

समय रहते अपने जीवन में गुरु का महत्व यदि एक शिष्य पहचान लेता है तो उसे अपने उज्जवल भविष्य की किरणें साफ-साफ नजर आती है, वहीं यदि वह इस कार्य में देरी कर लेता है और समय उसके हाथों से निकल जाता है तो फिर उसके पास पछताने के सिवा कुछ हाथ में नहीं रह आता।

हमें इस संसार में हमारे माता-पिता लेकर आए हैं, जो हमारा पालन-पोषण करते हैं हमें बाल्यकाल में चलना सिखाते हैं उठना बैठना सिखाते हैं। लेकिन हमारा जीवन सफल हो सके हम जीवन में सही राह पर चल सके हमारे भविष्य निर्माण में गुरु परम आवश्यक होते हैं।

कहा जाता है मानव में मौजूद संसार की अधिकतर बुराइयों को गुरु की सहायता से खत्म किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर जैसा कि आप सभी जानते हैं रामायण जैसे महाकाव्य की रचना महर्षि वाल्मीकि ने की थी उनका पुराना नाम रत्नाकर था। जीवन में शिक्षा न ग्रहण कर पाने एवं सही एवं गलत के बीच का फर्क बताने के लिए कोई गुरु ना होने की वजह से महर्षि वाल्मीकि अपने परिवार का पालन पोषण करने हेतु अनेक आपराधिक कार्य करते थे!

वे जंगल में आने जाने वाले व्यक्ति को लूट लिया करते थे और उनके पास जो भी कीमती वस्तु होती थी उसको लूट कर वे अपने परिवार का भरण पोषण करते थे! लेकिन एक दिन संयोगवश जंगल से नाराज जी गुजरे और सभी लोगों की तरह ही रत्नाकर ने नारद जी को भी  बंदी बना लिया! लेकिन इसी दिन से महर्षि वाल्मीकि के जीवन में अद्भुत परिवर्तन आया जिनसे वे एक रत्नाकर से महर्षि बाल्मीकि बन गए।

कहा जाता है कि उस दिन नारद जी ने बंदी बनने के बाद रत्नाकर से पूछा “तुम जो यह पाप कर रहे हो, और अपने परिवार का पालन कर रहे हो, जारा सोचो क्या तुम्हारे इस पापकर्म के परिवार के लोग भी भागीदार होंगे”

यह सुनकर जब रत्नाकर ने अपने परिवार से पाप के भागीदार बनने की बात कही तो किसी ने भी हां नहीं कहा और अपने पाप के भागीदार तुम स्वयं बनोगे!  यह सुनते ही महर्षि वाल्मीकि का का संसार से मोह भंग हो गया।

और उन्होंने नारद मुनि से इस पाप भरे जीवन से मुक्ति पाने का उपाय पूछा तो नारद मुनि ने कहा तुम राम नाम का जप करो! और यहीं से रत्नाकर भगवान राम की भक्ति में इतने लीन हो गए कि खुद ब्रह्मा जी ने उन्हें दर्शन देकर उन्हें महर्षी बाल्मीकि का नाम दिया और आगे चलकर उन्होंने महाकाव्य जैसे ग्रंथ की रचना की।

अतः एक गुरु के अंदर यह क्षमता होती है कि वह अपने शिष्य के जीवन का रुख मोड़ सके! अतः उन्हीं गुरु को सम्मानित करने का यह विशेष दिन गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है! इन्हीं शब्दों के साथ में अपने भाषण को विराम देना चाहूंगा।


भाषण 2 (Medium Speech On Guru Purnima In Hindi)

आदरणीय प्रधानाचार्य जी, शिक्षकगणों को गुरु पूर्णिमा के इस पावन पर्व पर नमस्कार! आज हम यहां सभी गुरु पुर्णिमा को मनाने के लिए उपस्थित हुए हैं इस अवसर पर मुझे यहां चंद शब्द बोलने का अवसर दिया गया है।

हिंदू कैलेंडर के अनुसार आषाढ़ (जून जुलाई के महीने) की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन छात्र/शिष्यों द्वारा अपने गुरुओं की पूजा की जाती है।

दरअसल गुरु की पूजा का विधान इसलिए है, क्योंकि भारतीय संस्कृति में गुरुओं का स्थान देवों से भी उच्च माना गया है। गुरु की कृपा से एक शिष्य कुछ भी अपने जीवन में हासिल कर सकता है जीवन में आने वाली प्रत्येक कठिनाइयों से निपट सकता है। गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती अतः किसी भी मनुष्य के जीवन में गुरु का होना अत्यंत आवश्यक है। बिना गुरु के जीवन एक ऐसे अंधकार रास्ते की ओर चला जाता है जहां से इंसान वापस नहीं आ पाता!

इसलिए गुरु पूर्णिमा के इस पावन पर्व पर शिष्य अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता एवं सम्मान व्यक्त करते हैं। इसलिए यह दिन गुरु को समर्पित किया जाता है। प्राचीन काल में जब छात्र गुरुकुल में शिक्षा हासिल करने जाते थे तो उस समय गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु की विशेष रूप से पूजा अर्चना की जाती थी एवं शिष्यों द्वारा गुरु से एक सफल भविष्य का आशीर्वाद लिया जाता था।

प्रतिवर्ष गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के दौरान आती है इस समय को अध्ययन के लिए भी अधिक अनुकूल माना जाता है।

आज के समय में भी गुरु पूर्णिमा के दिन छात्रों द्वारा अपने गुरु के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता का भाव प्रकट कर उन्हें इस दिन की शुभकामनाएं दी जाती है एवं शिष्य ऐसे ही जीवन भर अपना मार्गदर्शन करने का अपने गुरु से आशीर्वाद लेते हैं। भारतीय संस्कृति में गुरुओं को हमेशा से ही सम्मान दिया जाता है, अनेक लेखकों विद्वानों यहां तक कि कबीर दास जी ने भी अपने दोहे में गुरु की महिमा का बखान किया है प्रस्तुत है एक दोहा

गुरु सो ज्ञान जु लीजिये, सीस दीजये दान।
बहुतक भोंदू बहि गये, सखि जीव अभिमान॥

इस दोहे के माध्यम से कबीर दास जी कह रहे हैं कि अपने सिर- तासीर का बलिदान देकर भी गुरु से ज्ञान हासिल करें। कहीं लोग तन मन धन इत्यादि का अभिमान करते हुए इस सीख़ को न मानते हुए इस संसार से अलविदा हो गए।

गुरु पारस को अन्तरो, जानत हैं सब सन्त।
वह लोहा कंचन करे, ये करि लये महन्त॥

कबीर दास जी इस दोहे में कह रहे हैं कि गुरु और पारस यानी कि पत्थर के बीच का अंतर तो सभी संत भली-भांति जानते हैं!
पारस जहां लोहे को सिर्फ सोना बना देता है वही एक गुरु अपने शिष्य को ज्ञान देकर उसे अपने समान ही बना देता है।

तो साथियों गुरु के महत्व एवं उनके प्रति हमारे सम्मान का फर्ज गुरु पूर्णिमा दिवस हमें एहसास दिलाता है! अतः हम सभी को अपने गुरु का सदैव सम्मान कर उनके चरणों में शीश झुकाना चाहिए धन्यवाद।

भाषण 3 (Short Speech On Guru Purnima In Hindi)

जिस प्रकार इश्चरभक्ति भक्तों के जीवन को सफल बना देती है उसी प्रकार गुरुभक्ति में शिष्यों  के जीवन परिवर्तन कि शक्ति होती है। अतः कहा गया है व्यक्ति को ईश्वर के समान ही अपने गुरु का आदर करना चाहि ये।

इसलिए सदियों से गुरु पूर्णिमा के अवसर पर शिष्यों द्वारा गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता को प्रकट कर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। पुराने समय में छात्र गुरुकुल में पढ़ाई करते थे अतः गुरु पूर्णिमा के दिन विधि-विधान से शिक्षकों द्वारा गुरु की पूजा की जाती थी। उस समय गुरुकुल में गुरु पूर्णिमा के दिन पूजा अर्चना का विशेष प्रबंध किया जाता था शिष्यों द्वारा गुरु को दान दक्षिणा भी दी जाती थी।

लेकिन आज समय में परिवर्तन आने के बावजूद व्यक्ति के जीवन में गुरु का महत्व कम नहीं हुआ है। आज भी एक आदर्श सफल जीवन जीने हेतु गुरु का मार्गदर्शन उनका आशीर्वाद परम आवश्यक माना जाता है। वह शिष्य बड़ा भाग्यवान होता है जिसे अपने गुरुओं का आशीर्वाद प्राप्त हो! गुरु पूर्णिमा प्रत्येक वर्ष वर्षा ऋतु के समय आती है। हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ माह की पूर्णिमा का दिन गुरु पूर्णिमा का होता है।

अनेक स्थानों पर इस दिन को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी मनाया जाता है क्योंकि मान्यता है कि महर्षि वेदव्यास ने इसी दिन महाभारत की रचना की थी। इस दिन जो शिष्य अपने गुरु को दिल से याद कर उनकी पूजा-अर्चना करता है उनका आशीर्वाद प्राप्त करता है उसे गुरु द्वारा जीवन में सफलता की सीढ़ियां चढ़ने का आशीर्वाद मिलता है। गुरु को समर्पित यह दिन हमें सीख देता है कि हमें सदैव हमारे जीवन में गुरु के महत्व को नहीं बोलना चाहिए उनके प्रति श्रद्धा एवं सम्मान सदैव हमारे दिल में होना चाहिए।

निजी जिंदगी हो या फिर सामाजिक जीवन में मनुष्य को सफल होने के लिए सही मार्गदर्शन होना अत्यंत जरूरी है। जो छात्र समय रहते गुरु की शरण में रहते हैं वह जीवन भर अच्छे कार्य करते हैं समाज में प्रसिद्धि हासिल करते हैं एवं दूसरी तरफ जो गुरु के संपर्क में नहीं आते दुर्भाग्यवश वे शिक्षा से दूर हो जाते हैं और सामाजिक बुराइयों में लिप्त हो जाते हैं जिससे उनका जीवन अंधकारमय हो जाता है।

हमारे जीवन में गुरु एक दीपक के समान है जो हमें निरंतर प्रकाशमय जीवन की ओर ले जाते हैं। गुरु के महत्व पर आधारित कबीर दास जी के दोहे के साथ मैं इस भाषण को विराम देना चाहूंगा।।

गुरु समान दाता नहीं,
याचक शीष समान |
तीन लोक की सम्पदा,
सो गुरु दीन्ही दान ||

अर्थात: गुरु के समान कोई दाता नहीं, और शिष्य के सदृश याचक नहीं | त्रिलोक की सम्पत्ति से भी बढकर ज्ञान – दान गुरु ने दे दिया।

तो दोस्तों उम्मीद है की अब आपको Guru Purnima Speech for Students, Teachers and everyone, गुरुपूर्णिमा पर भाषण – Speech On Guru Purnima In Hindi के बारे में काफ़ी कुछ पता चल गया होगा।

उम्मीद है की आपको गुरुपूर्णिमा पर भाषण – Speech On Guru Purnima In Hindi! का यह पोस्ट पसंद आया होगा, और हेल्पफ़ुल लगा होगा।


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