सुभाष चन्द्र बोस पर निबंध – Subhash Chandra Bose Essay In Hindi

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सुभाष चन्द्र बोस पर निबंध – Subhash Chandra Bose Essay In Hindi! दोस्तों अगर आप सुभाष चन्द्र बोस पर निबंध लिखना चाहते हो तो आज इस पोस्ट में हम सुभाष चन्द्र बोस से जुड़ी जानकारी subhash chandra bose information in hindi, short and long essay on Subhash Chandra Bose In Hindi share करिंगे।

भारत की आजादी में अहम भूमिका निभाने वाले महान क्रांतिकारियों में से एक सुभाष चंद्र बोस के बारे मे अनेक लोगों के लिए आज भी पर्याप्त जानकारी नहीं है। अतः सुभाष चंद्र बोस पर निबंध के इस लेख में आपको उनके विषय पर विस्तार से जानकारी पाने का मौका मिलेगा

हमें आशा है यहां प्रकाशित निबंध आपको परीक्षा में या किसी स्टेज से नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर स्पीच देने हेतु मददगार साबित होंगे।


सुभाष चन्द्र बोस पर निबंध – Subhash Chandra Bose Essay In Hindi

निबंध 1 (400 Words)

प्रस्तावना

नेताजी सुभाष चन्द्र का जन्म 23 जनवरी, 1897 में कटक (उड़ीसा) में हुआ। वे एक मध्यम वर्ग परिवार से सम्बन्ध रखते थे। 1920 में वह उन भारतीयों में से एक थे, जिन्होंने ICS परीक्षा उत्तीर्ण की। 1921 में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य बने, पुन:1939 त्रिपुरा सेशन कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भारतीय राष्ट्रीय संग्राम में भारतीयों के लिए सबसे अधिक प्रेरणा के स्रोत रहें।

आजादी के संघर्ष में उन्होंने कहा था, “तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा” इस नारे को सुनते ही सभी जाति और धर्म के लोग खून बहाने के लिए तैयार हो गए। अनेक लोगों को नेता जी से बेहद लगाव था और मन में उनके लिए अटूट श्रद्धा थी।

नेताजी की पढ़ाई

नेताजी की प्रारंभिक पढाई कटक के रेवेंशाॅव काॅलेजिएट स्कूल में हुई। इसके बाद उनकी शिक्षा कलकत्ता के प्रेजिडेंसी काॅलेज और स्काॅटिश चर्च काॅलेज से हुई और बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने बोस को इंग्लैंड के केंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया।

अंग्रेज़ी शासन काल में भारतीयों के लिए सिविल सर्विस में जाना बहुत कठिन था, फिर भी उन्होंने सिविल सर्विस की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया।

1921 में भारत में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों के बारे में पता लगने पर बोस ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली और शीघ्र भारत लौट आए, उन्होंने सिविल सर्विस छोड़ दिया। उसके बाद वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गए।

क्रांति का सूत्रपात

सुभाष चन्द्र बोस जी के मन में छात्र काल से ही क्रांति का सूत्रपात हो गया था। जब काॅलेज के समय में एक अंग्रेज़ी के अध्यापक ने हिंदी के छात्रों के खिलाफ नफरत से भरे शब्दों का प्रयोग किया तो उन्होंने उसे थप्पड़ मार दिया, वहीं से उनके विचार क्रांतिकारी बन गए थे, असल में से पक्के क्रांतिकारी रोलेक्ट एक्ट और जलियांवाला बाग के हत्याकांड से बने थे।


कांग्रेस से त्याग पत्र

सुभाष चंद्र बोस क्रांतिकारी विचारधारा रखते थे इसलिए वह कांग्रेस के अहिंसा पूर्ण आन्दोलन में विश्वास नहीं रखते थे। इसलिए उन्होंने कांग्रेस से त्याग पत्र दे दिया था।

सुभाष चंद बोस अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड़कर देश को स्वाधीन करना चाहते थे। उन्होंने देश में हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए फारवर्ड ब्लाक की स्थापना की। उनके तीव्र क्रांतिकारी विचारों और कार्यों से त्रस्त होकर अंग्रेजी सरकार ने उन्हें जेल भेज दिया। जेल में उन्होंने भूख हड़ताल कर दी। जिसकी वजह से देश में अशांति फैल गयी थी, जिसके फलस्वरूप उनको उनके घर पर ही नजरबंद रखा गया था। बोस जी ने 26 जनवरी, 1942 को पुलिस और जासूसों को चकमा दिया था।

मृत्यु पर विवाद

ऐसा माना जाता है कि 18 अगस्त 1945 में एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु ताईवान में हो गयी परंतु उस दुर्घटना का कोई साक्ष्य नहीं मिल सका। सुभाष चंद्र की मृत्यु आज भी विवाद का विषय है और भारतीय इतिहास सबसे बड़ा संशय है।

उपसंहार

सुभाष चंद्र बोस महात्मा गांधी के अहिंसा के विचारों के साथ सहमत नहीं थे, क्योंकि वास्तव में महात्मा गांधी उदार दल का नेतृत्व करते थे और वहीं सुभाष चंद्र बोस जोशीले क्रांतिकारी दल के प्रिय थे। दोनों के विचार भिन्न भिन्न थे लेकिन उन्हें ये अच्छी तरह पता था कि हमारा मकसद एक है, यानी देश की आज़ादी, गांधी जी को सबसे पहले राष्ट्रपति कहकर सबसे पहले नेताजी ने ही बुलाया था।

निबंध 2 (500 Words)

प्रस्तावना

23 जनवरी 1897 का दिन विश्व इतिहास में स्वर्णक्षरों में अंकित है। इस दिन स्वतंत्रता अंदोलन के महानायक सुभाष चन्द्र बोस का जन्म कटक के प्रसिद्ध वकील जानकीनाथ तथा प्रभावती देवी के यहाँ हुआ।


उनके पिता ने अंग्रेजों के दमन चक्र के विरोध में ‘रायबहादुर’ की उपाधि लौटा दी। इस से सुभाष चन्द्र बोस के मन में अंग्रेजों के प्रति नफरत ने घर कर लिया, तब सुभाष अंग्रेजों से भारत को स्वतंत्र कराने का आत्म संकल्प ले, राष्ट्रकर्म की राह पर चल पडें।

आईसीएस की परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के बाद उन्होंने आईसीएस से भी इस्तीफा दे दिया। इस बात पर उनके पिता ने उनका उत्साह बढ़ाते हुए कहा-‘जब तुमने देश सेवा का व्रत ले ही लिया है, तो कभी इस पथ से विचलित मत होना।

कांग्रेस से इस्तीफा

1938 में उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। उन्होंने बोला था-‘ मेरी यह इच्छा है कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में ही हमें स्वाधीनता की लड़ाई लड़ना है, हमारी लड़ाई केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद से नहीं, विश्व साम्राज्यवाद के साथ है, लेकिन धीरे धीरे कांग्रेस से सुभाष चन्द्र बोस का मोह भंग होने लगा।

16 मार्च 1939 को सुभाष चन्द्र बोस ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया, फिर सुभाष चन्द्र बोस ने आजादी के अंदोलन को एक नई राह देते हुए युवाओं को संगठित करने का प्रयास किया। यह कार्य पूरी निष्ठा से शुरू कर दिया, इस शुरुवात 4 जुलाई 1943 को सिंगापुर में ‘भारतीय स्वाधीनता सम्मेलन’ के साथ हुईं।

आजाद हिंद फौज

5 जुलाई 1943 को ‘आजाद हिंद फौज का विधिवत गठन हुआ। 21 अक्टूबर 1943 को एशिया के विभिन्न देशों में रहने वाले भारतीयों का सम्मेलन कर उसमें अस्थायी स्वतंत्र भारत सरकार की स्थापना कर नेता जी ने आजादी प्राप्त करने के संकल्प को साकार किया।

12 सितम्बर 1944 को रंगून के जुबली हाॅल में शहीद यतींद्र दास के स्मृति दिवस पर नेता जी ने अत्यंत म्राम्रिक भाषण देते हुए कहा -, अब हमारी आजादी निश्चित है, परंतु आजादी  बलिदान मांगती है, आप मुझे खून दो मैं आपको आजादी दूंगा’, यही देश के नौजवानों में प्राण फूंकने वाला वाक्य था, जो भारत ही नहीं विश्व के इतिहास में भी अंकित है।

16 अगस्त 1945 को टोक्यो के लिए निकलने पर ताईहोकु हवाई अड्डे का दुलारा सदा के लिए,  राष्ट्रप्रेम की दिव्य ज्योति जलाकर अमर हो गया।

अब हम राष्ट्रीय योजना समिति पर बात करते हैं सुभाष चन्द्र बोस को जल्द ही ‘ बंगाल अधिनियम’ के अन्तर्गत दोबारा जेल में डाल दिया गया। इस दौरान उनको करीब एक साल तक जेल में ही रहना पडा़ और बाद में बीमारी की वजह से उन्हें जेल से रिहाई मिली।

उनको भारत से यूरोप भेज दिया गया। वहाँ उन्होंने भारत और यूरोप के मध्य राजनीतिक और संस्कृति संबंधों को बढाने के लिए कई शहरों में केंद्र स्थापित किए। उनके भारत आने पर पाबंदी होने के बावजूद भी वह भारत आए और परिणामतः उनको एक साल के लिए जेल जाना पड़ा।

1937 के चुनावों के बाद कांग्रेस पार्टी 7 राज्यों में  सत्ता में आई और इसके बाद सुभाष चन्द्र बोस को रिहा किया गया, इसके कुछ समय बाद सुभाष कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में अध्यक्ष चुने गए।

कार्यकाल

अपने कार्यकाल के दौरान सुभाष चन्द्र बोस ने ‘राष्ट्रीय योजना  समिति’का गठन किया। 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन में सुभाष चन्द्र बोस को दोबारा अध्यक्ष चुन लिया गया। इस बार सुभाष का मुकाबला पट्टाभि सीतारमैया से था।

सीतारमैया को महात्मा गांधी जी का पूर्ण समर्थन प्राप्त था, फिर भी 203 मतों से सुभाष चन्द्र बोस चुनाव जीत गए, लेकिन गांधी जी ने पट्टाभि सीतारमैया की हार को अपनी हार बताकर अपने साथियों से कह दिया कि अगर वह सुभाष के तरीकों के साथ सहमत नहीं है तो वे कांग्रेस से हट सकते हैं।

इसके बाद कांग्रेस कार्यकारिणी के 14 में से 12 सदस्यों  ने इस्तीफा दे दिया। जवाहरलाल नेहरू तटस्थ बने रहें और अकेले शरदबाबू सुभाष चन्द्र बोस के साथ रहे।

उपसंहार

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक अग्रणी नेता थे।  बोस जी ने जनता के बीच राष्ट्रीय एकता, बलिदान और साम्प्रदायिक सौहार्द की भावना को जागृत किया था।

निबंध 3 (600 Words)

प्रस्तावना

भारतीय इतिहास में सुभाष चन्द्र बोस एक सबसे महान व्यक्ति और बहादुर स्वतंत्रता सेनानी थे। भारत के इतिहास में स्वतंत्रता संघर्ष के लिए दिया गया उनका महान योगदान अविस्मरणीय हैं, वो वास्तव में भारत के एक सच्चे बहादुर हीरो थे।

जिन्होंने अपनी मातृभूमि की खातिर अपना घर त्याग दिया था। वह हिंसा में विश्वास करते थे, उन्होंने ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता पाने के लिये सैन्य विद्रोह का रास्ता चुना।

पारिवारिक परिचय

उनका जन्म 23 जनवरी 1897 को एक हिन्दू परिवार में उड़ीसा के कटक में हुआ था। उनके पिता जानकी नाथ बोस थे जो एक सफल बैरिस्टर थे और माँ प्रभावती देवी एक गृहणी थी।

सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कटक में एंग्लों इंडियन स्कूल से ली और कलकत्ता विश्वविद्यालय, स्काॅटिश चर्च काॅलेज से दर्शनशास्त्र में स्नातक की डिग्री प्राप्त की।

स्वतंत्रता की लड़ाई

उन्होंने प्रतिभाशाली ढंग से आई.सी.एस की परीक्षा को पास किया था, लेकिन उसे छोड़कर भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई से जुडने के लिए 1921 में असहयोग अंदोलन से जुड गए।

क्योंकि सन् 1920 में गांधी जी ने असहयोग अंदोलन चलाया हुआ था। जिसमें बहुत से लोग अपना अपना काम छोड़कर भाग ले रहे थे। अंदोलन की वजह से लोगों में बहुत उत्साह था इसलिए सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी नौकरी को छोड़कर अंदोलन में भाग लेने का निर्णय कर लिया था। 20 जुलाई, 1921 में सुभाष चन्द्र बोस जी गांधी जी से पहली बार मिले थे। सुभाष चन्द्र बोस को नेताजी नाम भी गांधी जी ने ही दिया था।

“गांधी जी को राष्ट्रपिता कहा”

6 जुलाई 1944 को आजाद हिन्द रेडियो पर अपने भाषण के माध्यम से गांधी को संबोधित करते हुए नेताजी ने जापान से सहायता लेने का अपना कारण और आर्जी-हुकूमते-आजाद-हिंद और आजाद हिन्द फौज की स्थापना के उद्देश्य के बारे में बताया। इस भाष्ण के दौरान नेता जी ने गांधी जी को राष्ट्रपिता कहा तभी गांधी जी ने भी उन्हें नेताजी कहा।

“जब सुभाष चन्द्र बोस जी ने ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया”

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आजाद हिन्द फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत पर आक्रमण किया। अपनी फौज को प्रेरित करने के लिये नेताजी ने ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया। दोनों फौजों ने अंग्रेजों से अंडेमान और निकोबार द्वीप जीत लिये। यह द्वीप आर्जी-हुकूमते-आजाद-हिन्द के अनुशासन में रहे, नेताजी ने इन द्वीपों को ‘शहीद द्वीप’ और ‘स्वराज द्वीप’ का नया नाम दिया। दोनों फौजों ने मिलकर इंफाल और कोहिमा पर आक्रमण किया, लेकिन बाद में अंग्रेजों का पलड़ा भारी पड़ा और दोनों फौजों को पीछे हटना पडा़।

कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा

1939 का वार्षिक कांग्रेस अधिवेशन त्रिपुरी में हुआ। इस अधिवेशन के समय सुभाष चन्द्र बोस  तेज बुखार से इतने बीमार हो गए थे कि उन्हें स्टरे्चर पर लिटाकर अधिवेशन में लाना पड़ा।

गांधी स्वयं भी इस अधिवेशन में उपस्थित नहीं रहे और उनके साथियों ने भी सुभाष चन्द्र बोस को कोई सहयोग नहीं दिया। अधिवेशन के बाद सुभाष ने समझौते के लिए बहुत कोशिश की लेकिन गांधी और उनके साथियों ने उनकी एक ना मानी, परिस्थिति एसी बन गयी कि सुभाष कुछ काम ही न कर पायें, आखिर में तंग आकर 29 अप्रैल 1939 को सुभाष चन्द्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।

नेताजी के नाम से प्रसिद्ध सुभाष चन्द्र ने सशक्त क्रांति द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर 1943 को आजाद हिन्द की स्थापना की। नेताजी अपनी आजाद हिन्द फौज के साथ 4 जुलाई 1944 को बर्मा पहुंचे, यहीं पर उन्होंने अपना प्रसिद्ध नारा, ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ दिया।

मृत्यु:-

18 अगस्त 1945 को टोक्यो जाते समय ताइवान के पास नेताजी की मौत हवाई दुर्घटना में हो गई, लेकिन उनका शव नहीं मिल पाया। नेताजी की मौत के कारणों पर आज भी विवाद बना हुआ है, लेकिन हमें याद रहना छाइए की ऐसे क्रांतिकारी अमर हो जाते हैं, उनके यश और नाम को मृत्यु मिटा नहीं पाती है।

उपसंहार

सुभाष चन्द्र बोस जी ने स्वतंत्रता के लिए जिस रास्ते को अपनाया था वह सबसे अलग था। स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर मर मिटने वाले वीर पुरुषों में से सुभाष चन्द्र बोस का नाम अग्रगण्य है।

तो दोस्तों उम्मीद है की अब आपको आजके सुभाष चन्द्र बोस पर निबंध – Subhash Chandra Bose Essay In Hindi के इस पोस्ट में सुभाष चन्द्र बोस से जुड़ी जानकारी subhash chandra bose information in hindi, short and long essay on Subhash Chandra Bose In Hindi के बारे में काफ़ी कुछ पता चल गया होगा।


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