स्वामी विवेकानंद की जीवनी – Swami Vivekananda Biography In Hindi

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Swami Vivekananda Biography & swami vivekanand ka jeevan parichay in hindi! दोस्तों अगर आप स्वामी विवेकानंद जी के बारे में डिटेल में जानना चाहते हो तो आज इस पोस्ट में हम आपको Swami Vivekananda Information, Swami Vivekananda Story In Hindi, स्वामी विवेकानंद की जीवनी – Swami Vivekananda Biography In Hindi! के बारे में बतायींगे।

भारत एक ऐसी पावन भूमि है जहां पर जाने कितने संत तथा महात्माओं का जन्म हुआ है। उन्होंने अपने ज्ञान के माध्यम से केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में जागरूकता फैलाई है। ऐसे ही एक महात्मा है जिनको स्वामी की उपाधि प्राप्त है, उनका नाम स्वामी विवेकानंद है।

आज हम इस लेख में आपको Swami Vivekananda (स्वामी विवेकानंद की जीवनी – Swami Vivekananda Biography In Hindi) के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी प्रदान करेंगे तथा यह भी बताएंगे कि उन्होंने अपने जीवन में कितने संघर्ष तथा अपने ज्ञान के माध्यम से पूरी दुनिया को प्रकाशवान किया है। उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि आज भी हम उन्हें अपने आदर्श के रूप में मानते हैं।

स्वामी विवेकानंद की जीवनी – Swami Vivekananda Biography In Hindi

स्वामी विवेकानंद के बारे में जितना भी बखान करें उतना कम है, क्योंकि वह परोपकारी तथा बुद्धिमान व्यक्ति थे। आज भी उनके विचार हम अपनाते हैं। स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम नरेंद्र नाथ दत्त था।  विवेकानंद बड़े ही स्पष्टवादी तथा सिद्धांतवादी व्यक्ति थे। उन्होंने एक नए समाज की कल्पना की थी, ऐसा सामाज जिसमें सभी जाति या धर्म के मनुष्य  के साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा।

इस समाज में सभी को समान शिक्षा तथा मानवी सिद्धांतों का ज्ञान दिया जाएगा नरेंद्र बचपन से ही धर्म एवं अध्यात्म के प्रति बड़ी गहरी आस्था रखते थे। वह हमेशा लोगों को सत्य बोलने की शक्ति प्रदान करते थे। उन्होंने  शिकागो के धर्म महासम्मेलन में एक भाषण दिया था, जिसकी चर्चा देश दुनिया में हुई। उन्होंने उस भाषण के माध्यम से लोगों को मानवता तथा अपने धर्म के प्रति आस्था रखना, इसके साथ ही सांप्रदायिक मतभेदों को अपने दिमाग से निकाल देने का आग्रह किया था।

स्वामी विवेकानंद का जन्म

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 में कोलकाता में हुआ था। उनके बचपन का नाम नरेंद्र नाथ दत्त था। वह बचपन से ही बहुत ही विद्वान एवं सभ्य बालक थे तथा बचपन से ही परमात्मा को पाने की उनकी लालसा भी प्रबल थी।

स्वामी विवेकानंद का पारिवारिक जीवन

नरेंद्र के पिता का नाम श्री विश्वनाथ दत्त था, जो एक वकील थे। उनके पिता कोलकाता हाई कोर्ट में वकालत करते थे। उन्होंने अपने पिता से बहुत सारा कानूनी ज्ञान प्राप्त किया। उनके पिता अंग्रेजी पढ़ाया करते थे। उनकी माता का नाम श्रीमती भुवनेश्वरी देवी था, जो एक ग्रहणी थी। उनकी आस्था धार्मिक विचारों के प्रति अधिक थी। उनकी माता ज्यादातर समय भगवान शिव की पूजा अर्चना में ही बिताया करती थी। इन सारी चीजों को नरेंद्र देखा करते थे और इसी के वजह से उनमें परमात्मा तथा धर्म के प्रति बहुत ही लगाव होने लगा था।

बचपन से ही स्वामी विवेकानंद अत्यंत कुशल तथा नटखट बालक थे। वह अपने साथियों के साथ खूब शरारत किया करते थे। वह अपने अध्यापकों के साथ भी शरारत करने से बाज नहीं आते थे। उन्हें पुराण, रामायण, महाभारत आदि की कथा सुनने का बहुत शौक था। ज्यादातर वह अपनी माता के साथ ही पूजा पाठ के कामों में चले जाया करते थे। यदि नगर में कहीं पर भजन कीर्तन हुआ करते थे तो वह भी उन में भाग ले लेते थे।

उनमें धार्मिक प्रबलता इतनी थी कि वह अपने आसपड़ोस के लोगों तथा मातापिता से ईश्वर के बारे में कई सारे प्रश्न पूछा करते थे जिसका उत्तर कभीकभी तो कोई भी नहीं दे पाता था।

स्वामी विवेकानंद की शिक्षा

उस समय पढ़ाई लिखाई को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था, क्योंकि मातापिता भी शिक्षित नहीं होते थे और ना ही उनके पास इतना धन हुआ करता था कि वह अपने बच्चों को पढ़ा सके, परंतु नरेंद्र 8 साल की उम्र से ही शिक्षा प्राप्त करने लगे थे। नरेंद्र नाथ ने एक ईश्वर चंद विद्यासागर के मेट्रोपॉलिटियन संस्थान में प्रवेश ले लिया, फिर उनका परिवार रायपुर चला गया। कोलकाता वापसी के बाद उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया और वहां पर प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए।

न्हें धर्म दर्शन, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य विषयों में बड़ी ही रुचि थी। उन्होंने इसके अतिरिक्त भी वेद, भागवत गीता, उपनिषद, रामायण, महाभारत और पुराणों में भी गहनता से अध्ययन किया था। नरेंद्र को भारतीय शास्त्रीय संगीत का भी ज्ञान था। नरेंद्र नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम एवं खेलकूद में भी भाग लिया करते थे। उन्होंने पश्चिमी दर्शन और यूरोपीय इतिहास का अध्ययन जनरल असेंबली इंस्टिट्यूशन से किया था।

वर्ष 1884 में उन्होंने कला स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी। स्वामी विवेकानंद ने स्पेंसर की किताब एजुकेशन का बंगाली में अनुवाद किया था, इस तरह से उन्होंने बहुत से क्षेत्रों में अध्ययन किया था।

स्वामी विवेकानंद की यात्राएं

स्वामी विवेकानंद ने पैदल ही पूरे भारत की यात्रा कर ली थी। उन्होंने केवल 25 वर्ष की आयु में ही गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया था। उन्होंने 31 मई 1893 को अपनी यात्रा शुरू की, वह जापान के कई शहरों जैसे टोक्यो, क्यूटो, नागासाकी आदि शहरों में गए उन्होंने चीन और कनाडा की भी यात्राएं की। 1893 में नरेंद्र अमेरिका के शिकागो शहर में पहुंचे वहां पर विश्व धर्म परिषद की बैठक हो रही थी तो वहां पर भी उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज की। उस समय अमेरिकी और यूरोपीय नागरिक भारतीय परिधान को बहुत ही हीन दृष्टि से देखा करते थे।

3 वर्ष नरेंद्र अमेरिका में रहे और वहां के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान के बारे में अद्भुत ज्ञान दिया। उनके बोलने की शैली तथा ज्ञान को देखते हुए अमेरिकी मीडिया ने उन्हें साइक्लोनिक हिंदू  के नाम से नवाजा था। उन्होंने अमेरिका में रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखाएं स्थापित की। नरेंद्र हमेशा अपने आप को गरीबों का सेवक मानते थे, उनके अच्छे ज्ञान तथा व्यवहार के वजह से अमेरिकी विद्वानों ने भी उनको अपना गुरु मानना शुरू कर दिया था।

स्वामी विवेकानंद और उनके गुरु का ज्ञान

एक बार नरेंद्र को रामकृष्ण परमहंस के बारे में किसी व्यक्ति के मुख से प्रशंसा करते हुए सुन लिए, फिर नरेंद्र परमहंस जी से मिलने के लिए गए किंतु परमहंस ने उन्हें देखते ही पहचान लिया था। जिसका उन्हें कई दिनों से इंतजार था। रामकृष्ण परमहंस के ज्ञान के माध्यम से उन्हें आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई। इसके फलस्वरूप नरेंद्र रामकृष्ण परमहंस के शिष्य बन गए, फिर उन्होंने परमहंस के मार्ग पर चलना चालू कर दिया और उन्होंने संन्यास ले लिया, बाद में इनका नाम नरेंद्र से विवेकानंद हो गया।

उन्होंने अपना पूरा जीवन अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर दिया  उन्हें अपने गुरु के प्रति इतना आदर और सम्मान था कि उन्होंने अपने परिवार की नाजुक हालत की परवाह किए बिना, वे अपने गुरु के सेवा में हमेशा हाजिर रहते थे। परमहंस जी को कैंसर के कारण काफी परेशानी होती थी, विवेकानंद अपने गुरु की साफसफाई तथा उनके खानपान की अच्छे से देख रहे किया करते थे।

एक बार गुरु की सेवा करते हुए किसी व्यक्ति ने उनके प्रति घृणा और लापरवाही दिखाई, जिस वजह से विवेकानंद को बहुत ही गुस्सा आया। उस गुरु भाई को गुरुदेव के प्रति कर्तव्य का पाठ पढ़ाने के लिए, उन्होंने बिस्तर के पास रक्त, कफआदि से भरी थूक दानी को उठाकर पी लिया

गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से वे अपने गुरु के शरीर और उनके आदर्शों की उत्तम सेवा कर पाए। इस तरह से उनके साथ हमेशा उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस जी आशीर्वाद हमेशा रहा। उन्होंने अपने गुरु की सेवा को ही भगवान की सेवा माना। श्री रामकृष्ण परमहंस का निधन 16 अगस्त 1886 में हुआ।

रामकृष्ण मिशन की स्थापना

रामकृष्ण मिशन की स्थापना 1 मई 1897 में की गई थी इसकी शुरुआत स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शिष्य विवेकानंद द्वारा की गई थी इसका मुख्यालय कोलकाता में है। इस मिशन के माध्यम से दूसरों की सेवा और परोपकार को कर्मयोग मानकर इसे चालू किया गया था। इसके अंतर्गत हिंदू धर्म के सिद्धांतों को अधिक महत्व दिया गया।

स्वामी विवेकानंद का शिकागो में भाषण

इस भाषण को विवेकानंद के जीवन का महत्वपूर्ण भाषण माना जाता है, क्योंकि इसमें जिन शब्दों का इस्तेमाल अमेरिकी नागरिकों के लिए किया आया था उसको देखते हुए वहां के लोग बहुत ही प्रभावित हुए थे उन्होंने अपने भाषण में कहा किमेरे अमेरिकी बहनों और भाइयोंइस वाक्य के साथ उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत की थी।

उन्होंने कहा कि आपने जिस स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया है, उसके प्रति आभार प्रकट करता हूं। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परंपरा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूं और सभी संप्रदायों एवं मतों के कोटि कोटि हिंदुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूं। हम लोग सब धर्मों में विश्वास रखते हैं।

हम समस्त धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं।  मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है।  जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ित और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। 

मुझे यह आपको बताते हुए गर्व हो रहा है कि  हमने अपने यहूदियों  के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था। जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मंदिर रोमन जाति के अत्याचारों से धूल में मिल गया था इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल उन्होंने अपने भाषण में किया था और वहां के नागरिकों का दिल जीत लिया था।

भारतीय संस्कृति में विवेकानंद का योगदान

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर कहते हैं कियदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िए उनसे आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएंगे उनमें नकारात्मक कुछ भी नहीं थाहम इस कथन से यह अनुमान लगा सकते हैं कि स्वामी विवेकानंद भारतीय संस्कृति के प्रति कितने आस्थावान तथा निष्ठावान थे। वे केवल एक संत ही नहीं थे, बल्कि एक महान देशभक्त, विचारक, लेखक और मानव प्रेमी भी थे।

30 वर्ष की आयु में स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका के शहर शिकागो में जाकर विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। इसी वजह से वह विश्व भर में विख्यात हो गए। विवेकानंद सहस्त्र या हिंसक क्रांति के जरिए भी देश को आजाद कराना चाहते थे परंतु उन्हें जल्द ही यह विश्वास हो गया था कि परिस्थितियां अभी अनुकूल नहीं है। इसके बाद विवेकानंद नेएकला चलोकी नीति का पालन किया। उन्होंने कहा था कि मुझे बहुत से युवा संन्यासी चाहिए जो भारत के ग्रामों में फेल कर देश वासियों की सेवा में लग जाए परंतु उनका यह सपना पूरा नहीं हुआ।

विवेकानंद धार्मिक आडंबर, पुरोहितवाद

से रूढ़िवादीता के सख्त खिलाफ थे। इस देश के 33 करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी देवताओं की तरह मंदिर में स्थापित कर दिया जाए और मंदिरों से देवी देवताओं की मूर्ति को हटा दिया जाए उनके इस विद्रोही बयान के वजह से उन्हें काफी मुसीबत का सामना करना पड़ा था।

स्वामी विवेकानंद के सिद्धांत

शिक्षा ऐसी हो जिसे बालक के चरित्र का निर्माण हो, मन का विकास हो, बुद्धि विकसित हो तथा बालक आत्मनिर्भर बने।
बालक एवं बालिकाओं दोनों को समान शिक्षा देनी चाहिए।
धार्मिक शिक्षा पुस्तकों द्वारा ना देकर आचरण एवं संस्कारों द्वारा देनी चाहिए।
पाठ्यक्रम में लौकिक एवं आलौकिक दोनों प्रकार के विषयों को स्थान देना चाहिए।
शिक्षा गुरु ग्रह में प्राप्त की जा सकती है।
शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक का शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास हो सके।
देश की आर्थिक प्रगति के लिए तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था की जाए।
सर्वसाधारण में शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार किया जाए।

स्वामी विवेकानंद के अनमोल वचन

उठो जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु

जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने शुक्ला यजुर्वेद की व्याख्या की और कहा एक और विवेकानंद चाहिए यह समझने के लिए कि इस विवेकानंद ने अब तक क्या किया है। उनके जीवन के अंतिम दिन में उन्होंने 2 से 3 घंटे ध्यान किया। 4 जुलाई 1902 को बेलूर में उन्होंने रामकृष्ण मठ में महासमाधि धारण कर ली और वहीं पर प्राण त्याग दिए। उनके शिष्यों ने उनकी स्मृति में वहां एक मंदिर बनवाया और उनके गुरु रामकृष्ण के संदेशों के प्रचार के लिए 130 से अधिक केंद्रों की स्थापना की।

आशा करता हूं मेरे द्वारा दी गई जानकारी से आप संतुष्ट होंगे। इस लेख का उद्देश्य स्वामी विवेकानंद के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी प्रदान करना है, ताकि लोग उनके व्यक्तित्व तथा जीवन शैली से कुछ सीख सके और अपने जीवन में उत्पन्न समस्याओं को सुलझा सकें। उनके गुणों और आचरण को धारण करें इसके साथ ही अपने गुरु के प्रति निष्ठा भी रखें।

उम्मीद है की अब आपको Swami Vivekananda Information, Swami Vivekananda Story In Hindi, स्वामी विवेकानंद की जीवनी – Swami Vivekananda Biography In Hindi से जुड़ी पूरी जानकारी मिल गयी होगी।

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